उस रात जंगल ज़रूरत से ज्यादा खामोश था। इतना खामोश कि नील को सूखी पत्तियों पर पड़ते अपने ही जूतों की आवाज़ किसी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। हवा ठंडी थी, पर उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
गाँव के बुज़ुर्ग हमेशा कहते थे—सूरज ढलने के बाद 'भैरव घाटी' के जंगल में कदम मत रखना। पर नील की मजबूरी थी। उसकी माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी और शहर से दवा लेकर लौटने का यही एकमात्र छोटा रास्ता था।
वह पगडंडी से बस कुछ ही फासले पर था, जब अचानक हवा का रुख बदला। फिज़ा में एक अजीब सी सड़ांध और गीली मिट्टी जैसी गंध घुल गई। नील के कदम वहीं जम गए। जंगल के सारे कीड़े-मकोड़ों की आवाज़ें एक झटके में बंद हो चुकी थीं।
सामने घनी झाड़ियों के पीछे से दो सुर्ख लाल आँखें चमकीं। वे आँखें किसी आम शिकारी की नहीं थीं—उनमें एक भयानक नफ़रत और भूख थी।
नील ने पीछे हटने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाया, एक सूखी लकड़ी के टूटने की आवाज़ हुई।
अगले ही पल, हवा में एक विशाल, काला साया उछला। नील संभल भी नहीं पाया कि सवा सौ किलो का भारी जिस्म सीधे उसके सीने पर आ गिरा। नील ज़मीन पर जा गिरा, दवा की पोटली हाथ से छूटकर बिखर गई।
सामने एक विशाल भेड़िया था—इंसान से भी दोगुना बड़ा। उसकी भारी साँसें नील के चेहरे को झुलसा रही थीं।
नील ने अपनी जान बचाने के लिए हाथ-पैर मारे, पर उस जानवर के भारी पंजों ने उसके दोनों कंधों को ज़मीन में धंसा दिया था। इससे पहले कि नील चीख पाता, उस खूँखार साये ने अपने नुकीले, खूनी दाँत सीधे नील के बाएं कंधे के मांस में गाड़ दिए।
"आहहह!"
दर्द की एक ऐसी भयानक लहर उठी जिसने नील की रूह तक कंपा दी। ऐसा लगा मानो किसी ने पिघला हुआ सीसा उसके जिस्म में उंडेल दिया हो।
मरता क्या न करता—नील का हाथ ज़मीन पर टटोलते हुए एक नुकीले, भारी पत्थर से टकराया। उसने अपनी पूरी बची-खुची ताकत समेटी और पत्थर सीधे भेड़िये की उसी लाल आँख पर दे मारा।
एक भयानक, दर्दनाक गुर्राहट गूँजी। भेड़िये की पकड़ ढीली हुई। वह तिलमिलाते हुए पीछे हटा और घने अंधेरे में गायब हो गया।
नील लहूलुहान होकर वहीं हांफ रहा था। कंधे से लगातार गरम खून बह रहा था, लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि उस ज़ख्म में आग जैसी जलन के साथ एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी।
वह लड़खड़ाते हुए उठा और जैसे-तैसे गाँव की सीमा तक पहुँचा। उसे लगा कि वह मौत के मुँह से बच निकला है। लेकिन वह यह नहीं जानता था कि उस जानवर के दाँत सिर्फ़ मांस चीरने के लिए नहीं थे... वे नील की रगों में एक ऐसा ज़हर छोड़ चुके थे, जो आज की इस पूरनमासी की रात को ही उसे गाँव का सबसे बड़ा 'हैवान' बनाने वाला था।
नील लड़खड़ाते हुए अपने कमरे तक पहुँचा। उसने अपनी माँ को आवाज़ नहीं दी ताकि वह डर न जाएं। उसने कांपते हाथों से अपनी फटी हुई कमीज़ उतारी और कंधे के उस गहरे ज़ख्म को देखने के लिए दीवार पर लटके पुराने आईने के सामने खड़ा हुआ।
आईने में अपनी पीठ देखते ही नील के हलक से चीख निकलते-निकलते रह गई। उसका पूरा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया।
ज़ख्म से अब खून नहीं बह रहा था।
भेड़िये के दाँतों के गहरे निशान खुद-ब-खुद सिलते जा रहे थे, जैसे चमड़ी के नीचे अनगिनत कीड़े रेंग रहे हों। कुछ ही पलों में वह भयानक घाव पूरी तरह गायब हो गया। लेकिन सबसे खौफनाक बात यह नहीं थी...
जब नील ने खौफ से अपनी नज़रें आईने में अपने चेहरे पर उठाईं, तो उसके होश उड़ गए।
आईने में दिख रही उसकी भूरी आँखें धीरे-धीरे बुझ रही थीं... और उनकी जगह दो दहकते हुए सुर्ख लाल अंगारे चमक रहे थे। ठीक वैसे ही, जैसे उस भेड़िये की थीं।
तभी खिड़की के बाहर, आसमान में काले बादलों को चीरता हुआ पूरा चाँद अपनी पूरी चमक के साथ बाहर आ गया।
नील का दिल सीने में पागल की तरह धड़कने लगा। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक भयंकर मरोड़ उठी... और उसके गले से इंसान की नहीं, एक खूंखार जानवर की पहली दबी हुई गुर्राहट निकली।
(क्या नील खुद को रोक पाएगा, या आज रात गाँव की पहली बलि चढ़ेगी? जानने के लिए पढ़ें अगला भाग...)